फूलों की घाटी
फूलों की घाटी (VALLEY OF FLOWERS)
विश्व विख्यात फूलों की घाटी उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की पहाड़ियों पर समुद्र तल से लगभग 12000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। जिला चमोली स्थित इस घाटी की खोज ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस स्मिथ ने 1931 में इत्तेफाक से की थी, जब वे कामेट अभियान से लौट रहे थे। यहाँ पहुंचने के लिए हरिद्वार तक ट्रेन या सड़क मार्ग से पहुँच कर वहां से कार या बस द्वारा देव प्रयाग, श्री नगर (गढ़वाल), रूद्र प्रयाग और जोशीमठ होते हुए गोविन्द घाट तक पहुंच सकते हैं। यात्रा का उचित समय जुलाई, अगस्त या पूर्वार्ध सितम्बर माह है, जो पास में ही स्थित सिखों के पवित्र तीर्थ हेमकुंड साहब के दर्शन का समय भी है। हरिद्वार एवं ऋषिकेश में इस दिशा की यात्रा के लिए टैक्सी भी उपलब्ध रहती हैं। बस द्वारा यात्रा करने के लिए ऋषिकेश से बदरीनाथ धाम तक की नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। गोविन्द घाट बदरीनाथ से 44 कि० मी०पहले मुख्य मार्ग पर ही स्थित है। ऋषिकेश से गोविन्द घाट तक का सम्पूर्ण मार्ग प्राकृतिक सुंदरता से भरा पड़ा है। इठलाती बलखाती गंगा (जाते समय ऋषिकेश से देव प्रयाग तक) और अलकनंदा (देव प्रयाग से गोविन्द घाट तक) नदियां विशाल पर्वतों के दामन से उलझते हुए हरियाली से भरपूर सुंदर दृश्यों के असंख्य नमूने इस प्रकार प्रस्तुत करती है मानो किसी विशाल पटल पर कैलिडोस्कोप देख रहे हों, जिसमें हरी चूड़ी के टुकड़ों की बाहुल्यता हो। इस प्रकार ऋषिकेश से गोविन्द घाट की लगभग 8 घंटों की यात्रा ऐसे पूरी हो जाती है मानो कोई सुंदर स्वप्न देखते हुए अचानक नींद से जगा दिया गया हो। देव प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी नदियों का संगम अनूठा दृश्य प्रस्तुत करता है। इस संगम के बाद ही इस पवित्र नदी को गंगा कहा जाता है।
फूलों की घाटी के लिए यात्रा का दूसरा चरण गोविन्द घाट से प्रारम्भ होता है। गोविन्द घाट से घांघरिया तक की कुल 13 कि०मी० की यात्रा पैदल अथवा टट्टू पर ही पूरी करनी होती है। बीमार या विकलांगो के लिए दांडी भी मिल जाती है। गोविन्द घाट गुरुद्वारे में रात्रि विश्राम करने और साथ का अधिक सामान क्लोक रूम में निःशुल्क रख कर आगे की यात्रा करने की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। फूलों की घाटी के पर्यटक और हेमकुंड साहब के तीर्थ यात्री अपना अधिकतर सामान यहीं रख कर केवल स्वयं ले कर चलने योग्य सामान ही अपने साथ ले कर आगे की यात्रा पर निकलते हैं। यात्रा का यह दूसरा चरण गोविन्द घाट से 13 कि०मी० की यात्रा के बाद घांघरिया (जिसे सिख लोग यहाँ स्थित गुरूद्वारे के नाम से गोविन्द धाम कहते हैं) पर समाप्त होता है। घाटी की यात्रा का अंतिम 3.5 कि०मी० मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है। गोविन्द घाट से घांघरिया (गोविंद धाम) तक का सम्पूर्ण मार्ग दोनों ओर प्राकृतिक रूप से लगे विभिन्न प्रकार के रंगबिरंगे और मनमोहक पुष्पों और पौधों से भरा पड़ा है। लक्ष्मण गंगा, जो गोविन्द घाट से गोविन्द धाम (घांघरिया) तक के पूरे मार्ग में यात्री का साथ देती है, कभी तो मार्ग से सैंकड़ो फ़ीट गहरी खाई में बहती है और कभी अत्यधिक नज़दीक आ जाती है। कहीं पर मानों किसी चट्टान विशेष से रूठ कर प्रपात के रूप में छलांग लगा लेती है या फिर अपना रौद्र रूप दिखने के लिए ऐसा स्वांग रचती है मानो उफनते हुए दूध की नदी हो। परन्तु इस रंगीन प्राकृतिक छटा के बीच में डर के साथ खून जमा देने वाले पल भी आते हैं जब बर्फ से लदे ढलवां रास्तों से गुजरना पड़ता है। कदम की ज़रा सी चूक हज़ारों फ़ीट गहरी खाई का रास्ता दिखा सकती है।
घांघरिया में ठहरने के लिए गोविन्द धाम गुरूद्वारे के अतिरिक्त गढ़वाल मंडल विकास निगम का होटल भी है, जहां पहले से आरक्षण करवा लेना बेहतर रहता है। यहाँ वन विभाग का डाक बंगला भी है जिसके लिए आरक्षण जोशीमठ स्थित नंदादेवी पार्क का डी०एफ०ओ० करता है। इसके अतिरिक्त ठहरने के लिए तम्बू भी उपलब्ध रहते हैं। दुर्गम होने के कारण घांघरिया में खाने-पीने का सामान बहुत ऊँची कीमत पर मिलता है।
घांघरिया से फूलों की घाटी और हेमकुंड साहब के लिए रास्ते अलग- अलग हो जाते हैं। फूलों की घाटी के लिए अंतिम चरण की यात्रा घांघरिया से सुबह जल्दी ही (लगभग 5 बजे) आरंभ करनी होती है, जिससे घाटी की सुंदरता के अवलोकनार्थ अधिक से अधिक समय मिल सके। घाटी में रात्रि विश्राम की कोई व्यवस्था नहीं है। तीसरे पहर बारिश होने के कारण वहां से जल्दी वापस आना ही बेहतर रहता है। घाटी की यात्रा का यह 3.5 कि०मी० अंतिम भाग पैदल ही पार करना होता है क्यों कि वहां टट्टू ले जाने पर प्रतिबंध है। इस मार्ग में भी दोनों ओर खिले विभिन्न फूल और वनस्पतियां अपने इंद्रधनुषी रंगों से पर्यटक का दिल आसानी से जीत लेते हैं। जैसे-जैसे घाटी की ओर कदम बढ़ते जाते हैं, प्रकृति के विभिन्न रूप चलचित्र की भांति आँखों के सामने आते जाते हैं। हिमाच्छादित धवल पर्वतों के साथ वनस्पति की हरियाली और आँखमिचौली खेलते बादलों के बीच से झांकता नीला आसमान मिल कर दुर्लभ दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
फूलों की घाटी औसतन 1.5 कि०मी० चौड़ी और 10 कि०मी० लम्बी है। घाटी में लगभग 360 किस्म के पुष्प भिन्न-भिन्न समय और स्थान पर खिलते हैं। यहाँ फूल और किसी भी प्रकार की वनस्पतियां तोड़ने पर प्रतिबंध है। यदि आप जुलाई और अगस्त के विभिन्न सप्ताहों में अलग-अलग समय पर घाटी की यात्रा करें तो हर बार नये किस्म के फूल खिले मिलेंगे।
वास्तव में लेखनी द्वारा फूलों की घाटी की सुंदरता का बयां करना असंभव सा लगता है। वहां की सुंदरता के बारे में लिखने के लिए कलम हाथ में लेने पर कुछ वैसी ही अनुभूति होती है जैसी गूंगे व्यक्ति से खाए गए फल की मिठास का बयान करने के लिए कहा जाये। अतः वहां की सुंदरता का आनंद लेने के लिए वहां जाना ही श्रेयस्कर है।
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