खतरों का सामना करते हुए
वाइल्डलाइफ में रूचि रखने वालों को वैसे तो जंगलों की ख़ाक छानने में बहुत मज़ा आता है, मगर कभी कभी ऐसी खतरनाक घटनायें हो जाती हैं जिनको याद करने
मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
कोलाहल करें या शांत रहें
वाकया सन 2000 का है। हम चार मित्र कॉर्बेट नेशनल पार्क में थे। शाम के नज़ारों का लुत्फ़ उठाने के लिये हमारी जिप्सी का ड्राइवर बनाम गाइड हमें घने जंगल के पार ले गया। कॉर्बेट में कुछ तज़ुर्बेकार ड्राइवर गाइड का लाइसेंस भी हासिल कर लेते हैं। डूबते
हुए सूरज और चरते हुए हिरनों के झुण्ड व राम गंगा के पानी में अठखेलियां करते हुए हाथियों की भरपूर फोटो खींचने के बाद
जब रोशनी कम हो गई तो हमारे ड्राइवर ने जिप्सी वापस चलने के लिये मोड़ दी। लेकिन यह क्या ? जिप्सी तो घड़घड़ा के शांत हो गई। ड्राइवर ने उसे पुनः चालू करने की भरपूर कोशिश की पर नाकामी ही हाथ लगी। जिप्सी वहां छोड़ कर पैदल वापस जाना ख़तरनाक भी था और
जंगल में पैदल चलने पर प्रतिबन्ध भी है। अतः मजबूरी में यह तै किया गया कि सब लोग जिप्सी को ढकेल कर ले चलेंगे। चूंकि मार्ग के एक ओर घनी ऊंची झाड़ियां थीं, इस बात का डर था कि शाम के धुंधलके का लाभ उठा कर कोई
शेर या तेंदुआ किसी पर हमला न कर दे। इसलिए सब लोग ज़ोर ज़ोर से बातें करते हुए
जिप्सी को ढकेलने लगे। ऐसा करने से हिंसक पशु दूर ही रहते हैं। अचानक
हमारे ड्राइवर ने सब को शांत हो जाने का इशारा किया। उसने अपने मार्ग पर लगभग 50 मीटर आगे की ओर इशारा किया। लगभग 40 - 50 हाथियों
का झुण्ड हमारे मार्ग को पार करता हुआ दूसरी ओर जा रहा था। साथ में
बच्चे होने के कारण हाथी इंसान को देख कर उग्र हो जाते जाते हैं। अतः हम लोग
जिप्सी के पीछे चुपचाप दुबक गए और हाथियों के झुण्ड के दूर चले जाने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे। लेकिन हम सब का खून यह सोच कर
जमा जा रहा था कि झाड़ी में से निकल कर अचानक कोई हिंस्र पशु हमला न कर दे। कुछ देर बाद जब हाथियों का झुण्ड दूर निकल गया तब हम सब की जान में जान आयी। हम लोगों ने फिर से ज़ोर-ज़ोर से बातें करना शुरू कर दिया और यह देख कर भगवान
को शुक्रिया अदा किया की हमारे सभी साथी सकुशल वहां मौज़ूद थे। धीरेन्द्र स्वरूप
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